Harish Rana Euthanasia Case Latest Update: मौत के इंतज़ार में हरीश राणा! 1 हफ्ते से बंद है खाना-पानी, AIIMS में इच्छामृत्यु की प्रक्रिया तेज

AHarish Rana Euthanasia Case Latest Update: IIMS में हरीश राणा का इच्छामृत्यु मामला चर्चा में, सुप्रीम कोर्ट की अनुमति के बाद पहली बार पैसिव इच्छामृत्यु, कभी भी दुखद खबर आने की आशंका

Harish Rana Euthanasia Case Latest Update: मौत के इंतज़ार में हरीश राणा! 1 हफ्ते से बंद है खाना-पानी, AIIMS में इच्छामृत्यु की प्रक्रिया तेज

Harish Rana Euthanasia Case Latest Update: दिल्ली के AIIMS अस्पताल में 32 वर्षीय हरीश राणा का मामला इन दिनों बेहद संवेदनशील और चर्चा का विषय बना हुआ है। देश में पहली बार सुप्रीम कोर्ट की अनुमति के बाद किसी मरीज को पैसिव इच्छामृत्यु दी जा रही है, और अब हालात ऐसे हैं कि किसी भी वक्त दुखद खबर सामने आ सकती है।

13 साल से जिंदगी और मौत के बीच जंग

हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से परमानेंट वेजिटेटिव स्टेट में थे, जो कोमा जैसी स्थिति मानी जाती है। साल 2013 में चंडीगढ़ में एक इमारत की चौथी मंजिल से गिरने के बाद उनके दिमाग को गंभीर चोट पहुंची थी। तब से वह पूरी तरह दूसरों पर निर्भर थे। लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद सुप्रीम कोर्ट ने 11 मार्च 2026 को उन्हें पैसिव इच्छामृत्यु की अनुमति दी। इसके बाद 14 मार्च को उन्हें गाजियाबाद से दिल्ली AIIMS के पेलिएटिव केयर यूनिट में शिफ्ट किया गया।

हटाए गए सभी लाइफ सपोर्ट सिस्टम

अस्पताल में भर्ती होने के बाद डॉक्टरों ने धीरे-धीरे सभी मेडिकल सपोर्ट सिस्टम हटा दिए। वेंटिलेटर, फीडिंग ट्यूब और अन्य उपकरणों को हटाकर हरीश को सामान्य बेड पर रखा गया है। अब उन्हें न तो कृत्रिम पोषण दिया जा रहा है और न ही पानी। शरीर को प्राकृतिक रूप से प्रतिक्रिया देने के लिए छोड़ दिया गया है, ताकि प्रक्रिया शांत और बिना दर्द के पूरी हो सके।

एक हफ्ते से खाना-पानी बंद

करीब एक हफ्ते से हरीश को कोई भोजन या पानी नहीं दिया गया है। मेडिकल टीम ने ब्लड टेस्ट जैसी प्रक्रियाएं भी रोक दी हैं। डॉक्टरों का कहना है कि यह प्रक्रिया एक से दो हफ्ते या उससे अधिक समय ले सकती है। अब शरीर की स्थिति पूरी तरह इस पर निर्भर है कि वह बिना बाहरी सहायता कितने समय तक कार्य कर पाता है।

डॉक्टरों की सबसे बड़ी चिंता

AIIMS की एक विशेष मेडिकल टीम लगातार हरीश की निगरानी कर रही है। पेलिएटिव केयर विशेषज्ञों के नेतृत्व में करीब 10 डॉक्टरों का बोर्ड इस पूरी प्रक्रिया को संभाल रहा है। डॉक्टरों की सबसे बड़ी प्राथमिकता यह सुनिश्चित करना है कि हरीश को किसी भी तरह की पीड़ा न हो। इसके लिए उन्हें लगातार दवाएं दी जा रही हैं, जिससे शरीर और मस्तिष्क को आराम मिले। अस्पताल के उस वार्ड में अब गहरा सन्नाटा है। पहले जहां मशीनों की आवाजें गूंजती थीं, अब वहां शांति है और इंतजार भी।

परिवार की लंबी पीड़ा और कठिन फैसला

हरीश का मामला सिर्फ एक मेडिकल केस नहीं, बल्कि एक परिवार के वर्षों के संघर्ष की कहानी भी है। उनके माता-पिता ने बेटे की जिंदगी के लिए हर संभव कोशिश की, लेकिन आखिरकार उन्होंने भी यह मान लिया कि यह निर्णय उनके बेटे के लिए राहत भरा हो सकता है। अब परिवार के लिए हर पल भारी है एक तरफ बेटे से बिछड़ने का दर्द, दूसरी ओर उसकी पीड़ा खत्म होने की उम्मीद।

यह मामला न केवल चिकित्सा जगत बल्कि समाज और कानून के लिए भी एक बड़ा सवाल खड़ा करता है, क्या जीवन और मृत्यु के बीच ऐसे फैसले आसान होते हैं? फिलहाल, AIIMS में हर नजर एक ही सवाल पर टिकी है अब आगे क्या?